कल शहर के राह  पर मैंने भीड़ देखा था ,

जहाँ एक नवजात कन्या को उसकी माँ ने फेंका था ,

मै बेबस था चुपचाप था बहुत परेशान था ,

मै उस नवजात की माँ की ममता पे बहुत हैरान था  ,

 

मै कुछ नही कह सकता था उस भीड़ से , क्युं कि मै भी एक इंसान था ,

पर क्या उस कुछ देर पहले जन्मी बच्ची  का नही कोई भगवान था ??

 

क्या उस माँ की कोख ने उस माँ को नही धिक्कारा होगा  ?

क्या उस नवजात की चीख ने उस माँ को नही पुकारा होगा ?

 

आखिर क्यूँ जननी काली  से कलंकिनी  बन जाती है ? 

जन्मती है कोख से और फिर क्यूँ कूड़े पे फेंक आती है ?

 

गर है ये एक पाप , तो क्यूँ माँ करती है उस पाप को ?

क्या शर्म नही आती उस बच्ची के कलंक कंस रूपी के बाप को ?

 

बिलखते हैं, चीखते हैं मांगते हैं रो-रो कर भगवान से ,

जो की दूर हैं एक भी संतान से ,

 

  उस नवजात को मारने  की वजह बढती हुई दहेज तो नही ?

 कुछ बिकी हुई जमीरों के लिए लकड़ियों की कुर्सी मेज तो नही ?

कुछ बिके हुए समाज के सोच की  नग्नता का धधकता तेज तो नही ?

 इस नवजात की मौत की वजह  किसी के हवस की शिकार सेज तो नही ?

 

बस एक बात पूछता हूँ उस समाज से , उस माँ से ,और उस भगवान से

क्यूँ खेलते हों मूक  निर्जीव सी नन्ही सी जान से  ??

 

आखिर क्यूँ मानवता पे यूँ गिरी है ये गाज ?

जिस माँ ने फेंका था उस नवजात को, उसी माँ से पूछना चाहता हूँ मै  आज .. 

 

क्या तुमने ऐसा अधम कुकृत्य किया होता ?

अगर तुम्हारी माँ ने भी तुम्हे अपने कोख से निकाल फेंक दिया होता ???????